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| वो संगदिल जब मुझे छोड़ दूर जाने लगी |
वो संगदिल जब मुझे छोड़ दूर जाने लगी राह ऐ मंजिल भी सुनसान जाने लगी;
ज़िन्दगी किया उजड़ी दो राहो के बिच हस्ती भी अपनी शमशान लगने लगी;
दाग लगा दामन पर इश्क़ का मुझपर अपनों मैं जाट बदनाम लगने लगी;
आँखों मैं आंसू लिए पुकारते रहे उसे अब तो साडी कोशिशे नाकाम लगने लगी;
तनहा बैठे है महकाने मैं अकेले महफ़िल मैं जग हसाई सरे आम लगी;
घनघोर उदासी मायूसी भरा माहौल मेरी ज़ीस्त गमो की गुलाम लगी;
साँसों मैं घुटन दिल मैं बे बसी भरी जीत बसी हुई उम्मीद साडी रब के नाम लगी;

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