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| ताबासूम मेरे भी लबो पर खिले |
ताबासूम मेरे भी लबो पर खिले ज़िन्दगी मैं अक्सर ख़ुशी ही मिले;
राह ऐ मंजिल पर तनहा न रहूँ हर मोड़ पर चलते अपने ही मिले
दिलवालो की महफ़िल जब लगी वहां अक्सर जीकर मेरा ही मिले;
ज़माने पर भरोसा करने के बदले नादान ऐ दिल को दर्द ही मिले;
खवाबो को संजोने की चाहत रही पर हर एक मंजर बंजर ही मिले;
डूबे मझदार मैं कोई साहिल न दिखा जिधर भी देखु समंदर ही मिले;
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