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| साहिल के करीब था फिर भी डूबता रहा मझधार मैं |
साहिल के करीब था फिर भी डूबता रहा मझधार मैं लोगो की हवस मैं जिस्म बिकते रहे बाजार मैं;
सम्भल जाती ज़िन्दगी हमारी भी किसी मोड़ वो लौट आता लम्हे न गुजरते इंतज़ार मैं;
महफ़िल हुआ करती थी हमारी भी कभी सुना हुआ आगाँ इस वक़्त की रफ्तार मैं;
कश्मकश थी हम दोनों के दरमियान दूरिया बढ़ गयी बे वजह तकरार मैं;
ज़ख्म बोहत थे कैसे सिलते हम तनहा जी गए आंसू न गिरे रुखसार मैं;
हर कोई आजमाइश करता है इश्क़ मैं हर जगह बिके गए उनके ऐतबार मैं;
राहो की तन्हाई मैं दर्द एसा बड़ा जीत चैन ओ सुकून खोया इश्क़ के वियापार मैं;

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