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| ये ज़िन्दगी का सफर अब नासूर होने लगा है |
मेरे कदमो को कोई मंजिल कोई राह दीजियेगा फूल न सही कांटो को बिछा दीजियेगा
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ये ज़िन्दगी का सफर अब नासूर होने लगा है मिल जाये इन से नियजात एसी दिशा दीजियेगा;
तुम बे वफ़ा हो फिर भी अहल ऐ जहां को चाहे झूठी ही सही मोह्हबत दिखा दीजियेगा;
खत मेरे पढ़ने अगर आंसू आ जाये तुमाहरे तो लिखे इन खतो को जला दीजियेगा;
तुमाहरी याद मैं पथर की मूरत हो गए है हो सके तो लौट कर थोड़ा रुला दीजियेगा;
बोहत तड़पा हूँ चैन की नींद के लिए अपनी गोद मैं सिर रख सुला दीजियेगा;
तू जहा रहे सदा खुश रहे ये दुआ है जीत गर कोई लम्हा तड़पाये तो भूला दीजियेगा;

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