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| मोह्हबत करने वालो ने अक्सर दर्द ही पाया है |
मोह्हबत करने वालो ने अक्सर दर्द ही पाया है चला गया जो दायर ऐ गैर वो लौट न पाया है;
राह ऐ मंजिल का मसाफ़त बोहोत कांटो भरा था ज़ख़्मी है कदम कोई भी मरहम न पाया है;
अहल ऐ जहाँ ने एसी दी है जफाये मुझको जिस महफ़िल मैं गए दुश्मन ही पाया है;
दिल ऐ फिगार था शब् ऐ फिराक मैं गम से दिन बा दिन खुद को क़फ़स ऐ तन्हाई मैं पाया है;
रूदाद मेरी ज़िन्दगी की जिस शख्स ने भी सुनी उसके सुर्खी ऐ रुखसार पर आंसू ही पाया है;
मोह्हबत की कहानियो पर जो यकीर करे जीतवो फस गया जज़्बातो मैं फिर निकल न पाया है;

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