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| तनहा सा सफर है मंजिल कहीं और |
मेरे माझी मुझे ले चल किसी और तनहा सा सफर है मंजिल कहीं और;
क़फ़स ऐ घूम मैं एसे फंस्ये के मायूस मन था ख़ुशी किसी और;
चमन ऐ दिल का हाल न पूछो पतझड़ छाया है हरयाली कही और;
थक गया इंतज़ार कर कर के जिस्म नाशाद साँसे कही और;
चेहरे पे चेहरा बदलती रही शोहरत मिली पहचान कही और;
हर गली सुनसान हर तरफ उदासी जो महफ़िल लगा ते वो महफ़िल कही और; न देख मेरी और इस तरह ज़ालिम तेरी जुबान झूठी अलफ़ाज़ कही और;
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