बज़्म ऐ अहल ऐ हुनर था हम भी अपना हुनर दिखाते चले,,,ghazal

बज़्म ऐ अहल ऐ हुनर था हम भी अपना हुनर दिखाते चले
बज़्म ऐ अहल ऐ हुनर था हम भी अपना हुनर दिखाते चले


बज़्म ऐ अहल ऐ हुनर था हम भी अपना हुनर दिखाते चले मोह्हबत की बात चली आंसुओ को हसी मैं छुपाते चले;
हुसन वालो से कैसे बचते दिल तो हमारा भी धड़कता है फ़क़त एसा घात लगा दिल पर दर बा दर भटकते चले;
हसरत ऐ परवाज़ थी बोहत पर धुल ही पड़ी चेहरे पर तकदीर ने एसा धुतकारा की ज़ख़्म पे ज़ख़्म मिलते चले;चशम ऐ तर हुई आलम ऐ तन्हाई किसी के गम से बदा के रिंड मैं अपनी दास्तान ऐ मोह्हबत बताते चले;
क़फ़स ऐ फ़सुर्दा मैं क़ैद ज़ीस्त मेरी कब तक तड़पती साँसे जिस्म से जुदा करके ग़म ऐ नाम उसके नाम कर चले;
गर कभी याद आये तो लौट आना मेरी कबर पर जीत तकलीफ न होगी ढूंढ़ने मैं नक़्श ऐ पा छोड़ते चले;


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