| सबा भी रुस्वा हो कर रुक गयी |
जो कली कल बागो मैं खिली थी आज किसके कदमो तले मुरझाई ह;
सबा भी रुस्वा हो कर रुक गयी सूरज की रौशनी मैं कमी आयी है;
उछाल लेने लगी समंदर की लहरें अब किस शहर ओ ग्राम की तबाही आयी है;
ये जानते है सब ख़तम होगा एक दिन ये कयानात जो कुदरत ने बनायी है;
रातो की बदलती चाल ना कोई जानता जैसे चाँद और तारो मैं दुरी आयी है;
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