| वो इज़हार ऐ इश्क़ करते रहे |
वो इज़हार ऐ इश्क़ करते रहे हम क़बूल करने से डरते रहे;
कई डर सीने मैं दबाये रहे यार ऐ दीदार को तरसते रहे;
सब रिश्ते पल मैं टूटे रहे जो मिले क़रीब से गुजरते रहे;
जितना भी उसको याद करते रहे तन्हाई के क़फ़स मैं फसते रहे;
दरिया किनारे जाके रोते रहे लोगो से अक्सर पत्थर पड़ते रहे;
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