दिल-ए-फिगार था तन्हाई के क़फ़स मैं
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| दिल-ए-फिगार था तन्हाई के क़फ़स मैं |
दिल-ए-फिगार था तन्हाई के क़फ़स मैं ,तड़प उठी साँसे दिल ना हुआ बस मैं ,
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उसके लौटने की तवाकु अब टूटने लगी हे,दीन बा दीन वक़्त की रेत छूटने लगी हे,
अहाल-ए-जाहा, ने इतनी जफा दी मेरे दिल को,के धड़कने करके बेवफाई थमने लगी हे,
शब-ए-फिराक मेरे मन मैं इतना शोरिश हुया,जिस्की गूंज से तबस्सुम भी मिटने लगी हे,
बे ज़क हुई जिंदगी को नाशाद करना चाहता हू,तन्हाई के क़फ़स मैं ज़ीस्त जलने लगी हे,
तन्हाई से से बचने को अपने दर्दो , से दोस्ती की,तो सबा भी मुझ तक आकर रूकने लगी हे,
बारसो तक नज़रे ,टिकाई उस्के इंतज़ार मैं ,अब तो सुरख ए रुखसार भी धाल्ने लगी हे,
dil e figaar---udaas mun
tawakko--umeed
jafaa--------------utpidan,dard,
ahal e jahaa,n-------is duniya ke log
shurkh e rukhsaar---gaalo,n ki laali
qafas---------pinjra
be zauq-----be suwaad
zeest-----jivan
tabassum-----muskaan
shorish-----ashanti
shab e firaaq----judai ki raat
hijr-----judai
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