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| लफ्ज चुप थे नज़रे सब बयान कर रही थी |
लफ्ज चुप थे नज़रे सब बयान कर रही थी क़फ़स ऐ तन्हाई मैं गुहार कर रही थी ;
गर्दिश मैं गुजरे है मेरे दिन और रात ये ज़िन्दगी हमसे खिलवाड़ कर रही है
महफ़िल मैं खड़े है फिर भी तनहा है रूह जिस्म से निकलने की पुकार कर रही है;
अहल ऐ जहाँ से किया शिकवे करे हम न जाने कोण जीने की दुआ कर रही है;
चली गयी राह ऐ मंजिल मैं छोड़के मुझे बस कश्ती बिन माझी वफ़ा कर रही है;
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