ज़ख़्म ये दिल के काफी नासूर थे
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| ज़ख़्म ये दिल के काफी नासूर थे |
ज़ख़्म ये दिल के काफी नासूर थे समझे नहीं किया हुए कसूर थे;
मोह्हबत के चर्चे होते थे चारो और वह हसीन ज़माने शायद कोई और थे;
सहते चुपचाप अपने गमो को हालत के आगे हुए इतने मजबूर तहत;
दो प्रेमियों को जुड़ा कर देनेका अहल ऐ जहांन के पुराना दस्तूर थे
मेरी बेबसी को वह संगदिल किया जाने जिनको अक्सर शोहरत के गुरूर थे;
यादों अक्सर उसको पा लेते है मेरी असल ज़िन्दगी मैं मिलो दूर थे;
आंसू आ गए थे हिजर की रात मैं जीत दिल तोड़के हसने वाले सनम मगरूर थे;
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