ज़ख़्म ये दिल के काफी नासूर थे ,,,,,,,,,,,,,,,,,dard shayari,

ज़ख़्म ये दिल के काफी नासूर थे 



ज़ख़्म ये दिल के काफी नासूर थे
ज़ख़्म ये दिल के काफी नासूर थे 


ज़ख़्म ये दिल के काफी नासूर थे समझे नहीं किया हुए कसूर थे;
मोह्हबत के चर्चे होते थे चारो और वह हसीन ज़माने शायद कोई और थे;
सहते  चुपचाप अपने गमो को हालत के आगे हुए इतने मजबूर तहत;
दो प्रेमियों को जुड़ा कर देनेका अहल ऐ जहांन के  पुराना दस्तूर थे
मेरी बेबसी को वह संगदिल किया जाने  जिनको अक्सर शोहरत के गुरूर थे;
यादों अक्सर उसको पा लेते है मेरी असल ज़िन्दगी मैं मिलो दूर थे;
आंसू आ गए थे हिजर की रात मैं जीत दिल तोड़के हसने वाले सनम मगरूर थे;




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