मैं मजबूर था अपनी मुहाबत का इजहार नहीं कर पाया,,,2,,line shayari

मैं मजबूर था अपनी मुहाबत का इजहार नहीं कर पाया




मैं मजबूर था अपनी मुहाबत का इजहार नहीं कर पाया;ज़माने का वोह पथर था उस चाँद की बराबरी नहीं कर पाया;




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